Monday, June 27, 2011

दोहे

1
चढ़ा बलि नैतिकता की
भूल गए सब कर्त्तव्यों को !
स्वार्थ का पीछा करने की
होड़ मची है इंसानों में !!
2
धर्म का चोला पहन के,
बात करें ये कैसी !
स्वामी अग्निवेश ने कर दी ,
सारे धर्म की ऐसी -तैसी !!
3
सारा देश लुटाय के ,
सरकार हो रही मस्त!
जनता भूखी मर रही ,
महंगाई कर रही त्रस्त !!
4
चोर लुटेरे, मंत्री ,
डाकू, संत फकीर
पूंजी पुरे देश की ,
खायी बना के खीर


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'

यादें





नहीं जानिब कोई अपना ,
तो सहारा देती हैं यादें !
कहीं दिल टूटते हैं तो ,
मलहम बन जाती है यादें
वो यादें ही होती हैं ,
जो बिछड़ों को मिलाती हैं!
जो खुशियाँ ढूंढ़ लें गम से,
ऐसी हमदम होती हैं यादें !!'


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'