Wednesday, November 11, 2009

तपिश (राष्ट्रदूत साप्ताहिक में प्रकाशित)

कोई कसर बाकि न रखी , तुमको पा लेने की मैंने ,
कि हर गुजारिश ने दम तोड़ दिया , आज तेरे आगे ।

कोई वजहात भी न थी , जो तुझसे जुदा था मैं ,
कि न जाने क्या गुनाह था , और कैसी सज़ा थी ये ।

बदगुमानी ने जो तन्हाई का तोहफा दिया है ,
कि अक्सर गुफ्तगुं होती रही , मेरी खामोशियों के साथ।

अब तो घुट गई है आवाज भी हलक में ,
कि कैसे बयां करूँगा मैं दीवाना -ऐ-हाल आज ।

वक्त कि तपिश के शिकार अकेले नही हैं हम ,
कि फैली पड़ी है राख , शहर-ऐ-तमाम में ।