Sunday, September 13, 2009

वर वचन

'फूला' मैं तुम्हे आज तक नही भुला।
ये जहर मेरी जीवन में तुमने क्यों घोला ।
मेरे आठ बच्चों की माँ तुम हो ,
ये अच्छी बात है।
अगर इन बच्चों की आठ अलग अलग माएं होती
तो बहुत अच्छा होता।
मेरी 'तम्मनाओं की कातिल ',
मेरी इच्छाओं के साथ यह अत्याचार तुमने क्यों किया ।

'हे आनंदमयी अत्याचारिणी ' हे गज गामिनी '
हे भार स्वामिनी ' हे अष्ट मर्दिनी ',
हे अभिलाषा विध्वन्सनी ' हे निद्रा अवसादिनी
हे स्वप्न विनाशिनी ' हे संताप दायनी
जिसे देख मेरे तीनो लोक कांपे , वो भय दायनी ।

तुम्हारी शरण में हूँ तुम्हारा वरन करके ।
चाहे मार दो चाहे तार दो ,
जीवन की वैतरणी तुम्हारे
ध्यान मात्र से ही पार लग जाती है ।
पर मैं जीवन अभिलाषी हूँ,

अतः हे ताड़न हारी , यम् देवी कृपा करो।
इस निर्धन पे दया करो ,
अपनी अष्टवाहिनी सेना के संग ,
अब ये प्रताड़ना बंद करो।

धुआं सा आदमी

अजीब जानवर है , ये धुआं धुआं सा आदमी ,
लगी जो आग जिस्म में , तो नोचता है जिस्म को।
इक बदनुमा सा दाग है , इस कहकशां में आदमी ।
अजीब जानवर है ......


जब भागती है जिन्दगी, तो रेंगता है आदमी ।
ख्वाहिशों की चाह में , फिसलता है आदमी
ठोकरों में वक़्त की , जो खेलता वो आदमी ।
अजीब जानवर है .......

आंधियां थी जब चलीं , सहम गया वो सहर में
टिमटिमा गया है जो , वो दिया है आदमी ।
स्वार्थों की होड़ में , जो जी गया वो आदमी ,

अजीब जानवर है ये धुआं धुआं सा आदमी।