Friday, November 19, 2010

शायद


तू अब हांसिल नहीं किसी को , जो मिलता था हमेशा ,
कि तू कभी ' आम ' था , अब 'ख़ास' हो गया है शायद !

तेरे वादों पर न रहा , एतबार अब किसी ,को
कि तू जो कहता है , वो करता नहीं शायद !

तेरी 'कथनी' तेरी 'करनी' से जुदा है हमेशा ,
कि तू निजामी में कोई दखल रखता है शायद !

फरेब करता रहा है 'जम्हूरियत' से हमेशा ,
कि ख्वाहिशों कि तामील,अब मुनासिब नहीं शायद !

ठोकर से गर्दिशों कि , जागा है यूँ आवाम,
कि तेरी झूंठी मेहरबानियाँ,अब न कबूल हों शायद !

आज तेरे सफ़ेद लिबास पे कोई दाग नहीं है ,
कि पोशीदा रूह की तरफ देख, मैलज़दा हो शायद !

तेरे शहर में एक ईमारत ढह गई,सैंकड़ो फ़ना हुए,
कि ज़रा सोच, दफिनें में तेरी भी 'लाश' दफ़न हो शायद !


तु करता रहा है 'दलाली' , मुल्क के गुरुर कि,
कि तेरी इस 'ज़लालत' की, भी कोई सजा हो शायद !!


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'