Saturday, July 23, 2011

ख्वाब डराने लगे हैं ...



तुम मेरे सभी ख्वाब रख लो , अब ये डराने लगे हैं !
फ़क़त , कोरी नींद चाहता हूँ मैं ,हादसे रोज जगाने लगें हैं!!

मैंने खामोशियों को ओढ़ लिया , एक लिहाफ की तरह !
इस खिली धूप में , सर्द कोहरे , फिर से छाने लगे हैं !!

मैंने देखा था जिन्हें अपने चारसू रोज घटते हुए !
की गीली आँखों से वो मंज़र अब धुंधलाने लगे हैं !!

मैंने बस इंसानियत ही तो मांगी थी , हुक्मरानों से !
की बगावत के मुझपे , अब इलज़ाम आने लगे हैं !!


कोई रंजिश तो ना थी मेरी , तेरे निजाम से !
की पर्चों में इनामी इश्तेहार अब आने लगे हैं!!

हम फ़रियाद करें भी तो किनसे ,अब ये तुम कहो !
सफेदपोश ,काले लिबास में अब नज़र आने लगे हैं !!

ये वक़्त-ऐ-क़यामत का दौर है ऐ ' तल्ख़ ' !
फिर गुलामी के दिन अब याद आने लगे हैं !!


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'