बेकरारियां बदल गई बेरुखी में आज ,
हमसफ़र मेरे , इसकी वजह तो बताते।
परवाने हम थे शमा उसका नाम था,
जलाना उसका काम था , जलना हमारा काम था।
मन की ख़ामोशी , तन की ख़ामोशी. ख़ामोशी इच्छाओं की , अरमानो की ख़ामोशी , सच को जान कर उसे न कह पाने की ख़ामोशी , बिन वर्षा प्यासी धरती की ख़ामोशी , बिन जल धारा तडपती नदी की ख़ामोशी , लहरों की हलचल में समुन्दर की ख़ामोशी , अत्याचारी निजाम में घुट घुट जीती आवाम की ख़ामोशी कब टूटेगी चारों और पसरी अविश्वास की ख़ामोशी , कब तोड़ेंगे हम ये ख़ामोशी ..........?
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Saturday, September 12, 2009
२ शायरी
निगाहों की ठोकर लगी आकर दिल पे ,
जली है चिताएं मेरी जुस्तुजू की ।
क्या गुजरी थी दिल पे ये आलम न पूछो ,
सुलगते थे अरमां सिसकती थी आँखे।
शगल हुआ करती थी , शरारत जिन निगाहों की ,
आज इनमे बसी इक शिकायत सी क्यों है ।
फरेब किसने ,किससे किया , क्या पता ,
चोट दिल को लगी , और घायल हुए ज़ज्बात।
जली है चिताएं मेरी जुस्तुजू की ।
क्या गुजरी थी दिल पे ये आलम न पूछो ,
सुलगते थे अरमां सिसकती थी आँखे।
शगल हुआ करती थी , शरारत जिन निगाहों की ,
आज इनमे बसी इक शिकायत सी क्यों है ।
फरेब किसने ,किससे किया , क्या पता ,
चोट दिल को लगी , और घायल हुए ज़ज्बात।
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