Showing posts with label वर्ष १९९८ में रचित. Show all posts
Showing posts with label वर्ष १९९८ में रचित. Show all posts

Wednesday, September 23, 2009

घर की गौरमेंट

सखा हमारे अनोखे राम
एक दिन घर से निकले रूखे रूखे ,
पूछा हमने '' कहो मित्र क्या हाल है '' वे तत्क्षण बोले
'' वही हड्डी वही खाल है ''।
'कुछ नया नही है बतलाने को कि घर कि संसद बेहाल है और
अस्थिरता का भुंचाल है ।
हमने कहा 'क्यूँ क्या हुआ सब खैरियत तो है '।
वे थोड़ा सकुचाये फ़िर बोले ' अजी ख़ाक खैरियत है'
बीबी पश्चिम तो अम्मा पूरब है ।
घर कि संसद त्रिशंकु है 'बीबी ,अम्मा और मैं जनादेश को तरसे हैं '
मैं तटस्थ हो कर फंस गया हूँ , दो पाटों में अटक गया हूँ,
अम्मा कहती '' दल बदलू '' है ,
उत्कर्ष हुआ है मुझसे तेरा , फ़िर भी नही समर्थन तेरा।
बीबी कहती ''नारी बिन है नर अधुरा '' बहुमत होगा पूरा मेरा ।
अम्मा मुझ पर हक़ जता कर ,
फौरन अपनी सत्ता चाहती ।
तो श्रीमतीजी नाक फुलाकर ,
अलग राज कि मांग है करती ।
अम्मा देती लालच मुझको और श्रीमती जी 'धमकी'।

उलझ गया हूँ किस उलझन में ,
हल नही आता ध्यान ।
और सखा ने ये किस्सा कह कर छोड़ा एक निश्वास ,
बोले तुम्ही मित्र हो तुम्ही सुझाओं इसका कुछ समाधान।
हम बोले '' हे सखा '' तुम्हारी ये सिचुएशन हे बड़ी विकत गंभीर ,
हमने ' देश' कि ऐसी हालत देखी , कभी न देखि घर कि ।
आज हमारे देश कि संसद जनादेश को तरसी है ।
मित्र तुम्हारी ग्रह स्तिथि कुछ कुछ बिल्कुल वैसी है।
'' भाई अनोखे एक काम करो तुम
जो तुमको बतलाएं हम ।
दोनों में से किसी एक को अपना 'बाह्य समर्थन ' दे दो ,
फ़िर पहिले से हाथ खींच कर दूजे को एक मौका देदो ।
या फ़िर दोनों में तुम एक समझोता कायम कर दो ,
कि छ : महीने हो एक कि सत्ता , और छ: महीने दूजे की ।
इससे सत्ता कि अभिलाषा फ़िर दोनों की पूरी होगी ,
इससे ''घर की गौरमेंट'' में स्थिरता भी लागू होगी ।
सम्पूर्ण देश में यही हो रहा घर की ऐसी तैसी ...
समझ गए ये सलाह हमारी मित्र अनोखे राम ,
घर जाते ही कर डाला ये समझोते का काम ,
समझोते का काम ' पहलवान ' काम तो आया
अब घर में खुशहाली का क्या समां है छाया ॥