Wednesday, June 8, 2011

शायरी



कल तक जो चलाता रहा दिलों पे नश्तर
आज उसका दिल भी लहुलुहान है !
की मैयत पर मेरी, तेरा अश्क जो टपका
ये मेरी मौत पर तेरा अहसान है !!

जज्बात ने अख्तियार कर ली शक्ल "हर्फ़ " की ]
काफिया , ग़ज़ल होने का अब अहसास मांगता है ,
हसरतें दिल की बदल गई , जुनून में अब ,
तू मिलेगा कभी तो ,यही इंतज़ार मांगता है !! ''


देखा नहीं ख्वाब तलक जिसका कभी
'वही' चेहरा -ओ-तस्वीर बनाता है दिल ,
मिल जाएँ कभी 'वो' मुराद बनकर ,
आरजू में उनकी , कसमसाता है दिल!!

'' तेरे ये शेर पढ़ कर दिल-ए-दर्द मिट जाता है,
की तेरी शायरी में कोई 'रूहानी' दखल रहता है !!
प्रवीश दिक्षित' तल्ख़'

Friday, February 25, 2011

पर्दा नशीं


पर्दानशीनों की महफ़िल में , सभी जुदा-नकाब हैं,
हम अनजान होकर भी , बड़ी पहचान रखते हैं।

तुम हमसे दूर रहते हो हम तुमसे दूर रहते हैं ,
तुम्हे हर बार छूने का , हम अहसास रखते हैं।

बड़े मशहूर हैं किस्से तेरी एय्यारी के ज़ालिम ,
हकीक़त मेरी भी लेकिन , फ़साने साथ रखती है।

हमें तुम ढूँढना चाहो ,ये मुमकिन नहीं शायद ,
हवा में घुल जाने का , हुनर हम साथ रखते हैं।

हमें महसूस करके तुम, हमारी चाह समझ लेना,
मिटा कर इस बदन को , अब रूह तेरे नाम करते हैं।



प्रवीश दिक्षित

फिर से शायद




इन सुलगते अंगारों को सहेज कर रखना ,
की कहीं ये सर्द रातें और लम्बी हों शायद।

सारी ताक़त अपनी बाजुओं में समेटें रखना ,
की फिर से वतन को तुम्हारी ज़रूरत पड़े शायद।

इन दरख्तों को अब कटने से बचाए रखना ,
की कल फिर यहाँ धूप तेज पड़े शायद।

तुम अपनी आँखों को अब खुली ही रखना,
की ये मंजर अब और खराब हों शायद ।

इन साहिलों की हदों को और कस के रखना,
की फिर से कोई तूफां यहाँ दस्तक दे शायद।

प्रवीश दिक्षित

Friday, November 19, 2010

शायद


तू अब हांसिल नहीं किसी को , जो मिलता था हमेशा ,
कि तू कभी ' आम ' था , अब 'ख़ास' हो गया है शायद !

तेरे वादों पर न रहा , एतबार अब किसी ,को
कि तू जो कहता है , वो करता नहीं शायद !

तेरी 'कथनी' तेरी 'करनी' से जुदा है हमेशा ,
कि तू निजामी में कोई दखल रखता है शायद !

फरेब करता रहा है 'जम्हूरियत' से हमेशा ,
कि ख्वाहिशों कि तामील,अब मुनासिब नहीं शायद !

ठोकर से गर्दिशों कि , जागा है यूँ आवाम,
कि तेरी झूंठी मेहरबानियाँ,अब न कबूल हों शायद !

आज तेरे सफ़ेद लिबास पे कोई दाग नहीं है ,
कि पोशीदा रूह की तरफ देख, मैलज़दा हो शायद !

तेरे शहर में एक ईमारत ढह गई,सैंकड़ो फ़ना हुए,
कि ज़रा सोच, दफिनें में तेरी भी 'लाश' दफ़न हो शायद !


तु करता रहा है 'दलाली' , मुल्क के गुरुर कि,
कि तेरी इस 'ज़लालत' की, भी कोई सजा हो शायद !!


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Monday, November 1, 2010

दीपों के इस पर्व पर ...



राह कैसी भी हो लेकिन ,
सत्य के पथ पर चलें हम,
उद्देश्य से भटकें नहीं ।
दीपों के इस पर्व पर
'पुरुष पुरातन कि वधु' का ,
हर्षमय स्वागत करें हम ॥
करके घरों में हम रंगोली के
रंगों कि चित्रकारी , इस धरा को,
एक नया अवतार दे दें ।
जगमग दीयों कि रौशनी से ,
मन के तिमिर को दूर कर दें
आओ मिल के 'विष्णुप्रिया' का ,
तेजोमय स्वागत करें हम ।।

ले, मन में उमंग , अपनों के संग
सपनों का संग , जीवन तरंग ,
उल्लासमय से इन पलों को
अपने ह्रदय में कैद कर लें ।
आओ मिल के 'धनदायनी 'का ,
शुभ्रमय स्वागत करें हम ॥

रख के उज्जवल मन में
निर्मल विचारों कि श्रेणियां ,
प्रेम बांटे , प्रीत बांटे ,
आज भर के झोलियाँ
दीपों के इस पर्व पर
आओ मिल के 'सुखदायनी ' का ,
आनंदमय स्वागत करें हम

Saturday, October 23, 2010

दिवाली आने को है -



अँधेरा डराता रहा है हर शख्स घबराया हुआ सा है
मसरूफ रहे हैं अब तक ,
अपने ही मायनों में
अब रुक जाएँ ये सिलसिले शायद ,
दिवाली आने को है.....

मुफलिस की कोठरी में ,
सिकुड़ता सा बचपन माँ के दामन से लिपटा,
देखता है पिता को
फिर बांध रही है उम्मीद ,
दिवाली आने को है .....

उदास थे अब तलक , घर और दर-ओ-दीवार
भर गया नया रंग-ओ-नूर सबके हिजाब में
सज उठे हैं दुल्हन की तरह,
दिवाली आने को है .......

परवाने ने पर तोले हैं फिर से शमां की चाह में
हर बार जलता रहा है वो जिसकी आरजू में
वो ज़ुस्तुज़ुं पूरी हो शायद ,
दिवाली आने को है ......

दीपों की जगमग है रोशनी का अहसास है
दूर हटेंगे ग़म सारे अब सुखों का अज़ान है
खुशियों का उन्माद जगाती ,
दिवाली आने को है.........

प्रवीशदीक्षित 'तल्ख़'

Sunday, June 13, 2010

मगर मैं खामोश रहूँ ...



हर जगह दर्द है पसरा ,
टीस सी दिल में बढ़ रही ,
बढ़ रही है ज़ख्मों में कसक ,
मगर मैं खामोश रहूँ। ....

फैल गए हैं स्वार्थ ,
समाज में सभ्य बनकर
अब झूंठ बिक रहा है,
सच की आड़ लेकर
मगर मैं खामोश रहूँ......

सड़क पे इंसान की लाश ,
वाहनों की रेलमपेल में
रुन्द्ती रही बार बार ,
बतियाते, आ जा रहे थे लोग
मगर मैं खामोश रहूँ। ..