Saturday, October 23, 2010

दिवाली आने को है -



अँधेरा डराता रहा है हर शख्स घबराया हुआ सा है
मसरूफ रहे हैं अब तक ,
अपने ही मायनों में
अब रुक जाएँ ये सिलसिले शायद ,
दिवाली आने को है.....

मुफलिस की कोठरी में ,
सिकुड़ता सा बचपन माँ के दामन से लिपटा,
देखता है पिता को
फिर बांध रही है उम्मीद ,
दिवाली आने को है .....

उदास थे अब तलक , घर और दर-ओ-दीवार
भर गया नया रंग-ओ-नूर सबके हिजाब में
सज उठे हैं दुल्हन की तरह,
दिवाली आने को है .......

परवाने ने पर तोले हैं फिर से शमां की चाह में
हर बार जलता रहा है वो जिसकी आरजू में
वो ज़ुस्तुज़ुं पूरी हो शायद ,
दिवाली आने को है ......

दीपों की जगमग है रोशनी का अहसास है
दूर हटेंगे ग़म सारे अब सुखों का अज़ान है
खुशियों का उन्माद जगाती ,
दिवाली आने को है.........

प्रवीशदीक्षित 'तल्ख़'

Sunday, June 13, 2010

मगर मैं खामोश रहूँ ...



हर जगह दर्द है पसरा ,
टीस सी दिल में बढ़ रही ,
बढ़ रही है ज़ख्मों में कसक ,
मगर मैं खामोश रहूँ। ....

फैल गए हैं स्वार्थ ,
समाज में सभ्य बनकर
अब झूंठ बिक रहा है,
सच की आड़ लेकर
मगर मैं खामोश रहूँ......

सड़क पे इंसान की लाश ,
वाहनों की रेलमपेल में
रुन्द्ती रही बार बार ,
बतियाते, आ जा रहे थे लोग
मगर मैं खामोश रहूँ। ..

Wednesday, January 6, 2010

आशियाँ (राष्ट्रदूत साप्ताहिक में प्रकाशित)

तेरे चाहने से ना बदलेंगी , ये रवायतें ये रस्मे ,
कि तू सिर्फ ज़र्रा है जहाँ में, कोई जुर्रत तो नहीं।

अक्सर सच होते रहे बद्ख्वाब अंदेशे भी मेरे ,
कि मिली नहीं ज़मीं भी ,मेरे रक्स-ऐ- नसीब को।

दरकती रही मेरी सोच , हमेशा तेरे बारे ,
कि कोई छलावा तो नहीं , तेरा प्यार मेरे बारे।


किये कई बार सजदे , मैंने तेरे आगे ,
कि तुने फेर लिया रुख , हर बार मेरे आगे।

मैं तेरी ज़फा का सताया , यूं गुमनाम न रहूँगा,
कि मैं इक बदमिजाज लम्हा , जो तफसील-ऐ-बयां बनूँगा।


तमन्नायीं ना रहा कभी , तेरे दीदार का मैं,
कि तो भी तेरा अक्स ,मेरे ज़ेहन में कहीं बसता है।

दिलबदर कर भी दूं , मैं तुझको , लेकिन ,
कि 'आशियाँ मेरे ख्वाब में, इक तुने बना रखा है।



प्रवीश दिक्षित




Saturday, November 21, 2009

तल्खी


















बिगडती है ,बनती है ,बन के फिर बिगड़ जाती है, तकदीर
लगता है खुदा को अक्सर , अब ये 'खेल' भाया है।

जिंदगी को बज़्म बनाने की हवस में ,
बदन को मशीं बना दिया मैंने ।

निशां छु भी न सका मंजिलों का ,अब तलक ,
कि मुसाफिर ये किस राह का हो गया हूँ मैं।

मैं दर्द का शैदाई और दुआओं का मुजरिम ,
कि मेरी तल्खी ख़ुद मुझसे है , खुदाई से नही।

अपनी ही बेबसी पे घुटता रहा हूँ मैं ,
कि अक्सर हर लम्हे से डरता रहा हूँ मैं।

अब ना रहा हालातों पे कोई अख्तियार मेरा ,
कि बदकिस्मती ,बेतकल्लुफ हो गई जिंदगी के साथ।



प्रवीश दीक्षित'तल्ख़'

Wednesday, November 11, 2009

तपिश (राष्ट्रदूत साप्ताहिक में प्रकाशित)

कोई कसर बाकि न रखी , तुमको पा लेने की मैंने ,
कि हर गुजारिश ने दम तोड़ दिया , आज तेरे आगे ।

कोई वजहात भी न थी , जो तुझसे जुदा था मैं ,
कि न जाने क्या गुनाह था , और कैसी सज़ा थी ये ।

बदगुमानी ने जो तन्हाई का तोहफा दिया है ,
कि अक्सर गुफ्तगुं होती रही , मेरी खामोशियों के साथ।

अब तो घुट गई है आवाज भी हलक में ,
कि कैसे बयां करूँगा मैं दीवाना -ऐ-हाल आज ।

वक्त कि तपिश के शिकार अकेले नही हैं हम ,
कि फैली पड़ी है राख , शहर-ऐ-तमाम में ।

Tuesday, October 27, 2009

जरा देर सही

ना बुझा उम्मीद के चिराग ,जिंदगी रोशन होगी कभी ,
ज़रा देर सही .........
छंट जाएगा ये अँधेरा , होगी सहर कभी न कभी ,
ज़रा देर सही...........

गुजश्ता जिंदगी को याद कर , वक्त- ऐ- सुखन आएगा कभी ,

ज़रा देर सही.........
कतरा कतरा लम्हे , कसक पर्वत सी , ये वक्त-ऐ-दर्द है कटता नही अभी,
जहाँ में , कोई तो होगा तेरा , कि 'फ़रिश्ता ' सिर्फ़ बयां नही ,

ज़रा देर सही...........
छटपटाया हमेशा जिसकी चाहत में , वो आरजू पूरी होती नही , अभी

सूनी है गलियां चाहत की , वीरां हैं शहर अरमानों के ,
बस जाएँगे वहां भी आशियाने , होगी रहगुज़र भी ,

ज़रा देर सही.........

ये बैचेनी , ये बेचारगी हो जाएंगी गर्क , महकेंगी कलियाँ खुशिओं की कभी ,
ग़मों का कफ़न ढक ना सकेगा , सुखों की लाश को ,

कि होगी फ़िर से कोई जुम्बिश ,
ज़रा देर सही........!

Friday, October 16, 2009

शुभ दीपावली

हर रोज सहर सूरज की किरने,
धरती को चूम के जाएं।
हर रोज तुम्हारे आँगन में ,
खुशियों की कलियाँ मुस्काएँ ।
यही दुआ करते हैं रब से ,
कि ऐ दोस्त तुम्हारे जीवन में
हर रोज दिवाली आये ॥