Monday, July 7, 2014

इक नया रंग फ़िज़ा में.......



इक नया रंग फ़िज़ा में घुल गया.
ये गोरा बदन अब ताम्बई हो गया। 
क्या हुआ, कैसे हुआ हमें क्या खबर
की ये वक़्त भी आसमानी हो गया।।
घुले हुए थे, साये अंधेरों में अब तलक.
उनका वजूद अब जिस्मानी हो गया ।
 
गम-ए-ज़िंदगी से तौबा कर लो ऐ 'तल्ख़'
ये आगाज़ है अब गम बेमानी हो गया।।
 
अकेले ही चले थे राहे सफर में मगर
तुम जब मिले सफर रूमानी हो गया।।

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Friday, August 16, 2013

ख्याल ने खामोशियों को.....




ख्याल ने खामोशियों को

ओढ़ लिया है  इस तरह ,

हम हैं की फ़क़त

झींगुरों के इजहार सुने जा रहे हैं

कोई चुप है तो कोई सुन रहा है ,

कोई थम गया तो कोई चल रहा है!

आज हर शख्स अपाहिज है

इंसान , रास्ते और मंजिलें ,

वक़्त चल रहा है , तब वहां था, अब वहां है

नादान है वो सब जो जीत पे इतराते हैं

देख वक़्त फिर वहीँ खड़ा हंस रहा है

तूफ़ान तो आकर गुजर ही जाते हैं अक्सर ,

बर्बादी की दास्ताँ कहने को साहिल खड़ा है
 
प्रवीश दीक्षित'तल्ख़' 

Monday, June 17, 2013

मेरे मेहरबां

 
मेरे मेहरबां की इन्तहा तो देखिये,
दर्द देकर भी नादान बने रहते हैं !  
 
बात करते हैं, उनसे मर्ज़-ऐ-दिल की ,
वो शफाखाने का पता दे देते हैं !!
 
कि वो एक अदद मुस्कराहट से,
जिस्म में हरारत बिखेर देते हैं !
 
कभी मानते हैं कभी रूठ जाते हैं,
मेरे यार मेरा नसीब बन जाते हैं !!
 
इन अदाओं पर नाजिश करें "तल्ख़",
वो पर्दानशीं होकर सब राज छुपाते हैं
 
प्रवीश दीक्षित "तल्ख़"

Saturday, May 25, 2013

वो नहीं जानते .........


दिल की चीरफाड़ से ,क्या हांसिल उन्हें
वो मेरे भोले सनम यह भी नहीं जानते !


ज़र्रा दर ज़र्रा, रग दर रग, टटोले जाते हैं
आरजू ओ तलाश क्या, ये भी नहीं जानते !

ज़ज्बे दिल में बने, आंखों से बयां होते हैं

पढ़ भी लेते, मगर रूबरू होना नहीं जानते !

सफों पे हर्फों से गुफ्तगू का है शौक उन्हें
ये कातिब राज ऐ दिल पढना नहीं जानते !


नज़र ये मिल भी जाए तो झुका लेते हैं" तल्ख़"
की मेरे कातिल , क़त्ल करना भी नहीं जानते !!


ढाई हर्फ़ के खेल को जो समझा, जहाँ पाया
उल्फत क्या होती हैं मेरे महबूब नहीं जानते !! 


प्रवीश  दीक्षित " तल्ख़"

 

Wednesday, May 22, 2013

एक ख्याल फिर से ...



किसी की ख़ामोशी के सदके
ये अजब सी वार फेर है !

कि शोर ने समझी है,
आज जुबां सन्नाटों की !


एक मचलते सुर ने आज
वीरान साज़ पे इनायत की है!

कि इन खामोश तरानों को ,
हसीं ख्याल ने गुनगुनाया है


इकरार है या इजहार , खुदा जाने
कि फिर से बारिश ने आज
तपती ज़मीं को जिंदगी दी है
 

अंजामे उल्फत को अबतलक,
इस जहाँ में किसने जाना है,
की उनके बरमला इश्क में
हमने अपनी रज़ा दी है !!


प्रवीश  दीक्षित ' तल्ख़'

 

Monday, May 13, 2013

ख्याल / ख़ामोशी


मेरी ख़ामोशी को वो आज फिर हिला गया ,
इक ख्याल मेरे जेहन से फिर टकरा गया !


तनहाइयाँ लिपटी हुई थी किसी बेल की तरह ,
इक तूफ़ान इस दरख़्त से फिर टकरा गया !!


बादलों की शरारत थी चाँद को ज़मीं ना मिली,
शोख झोंका हवा का इक चिलमन को हटा गया !!


उनकी ये चाहत थी कि हम उन्हें पनाह दें ,
इक खंजर ये गुजारिश इस दिल से कर गया !!


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'


 

Wednesday, February 6, 2013

ये क्या हो रहा है ........



एक वैचारिक अकाल सा मचा है,
इंसानी दिमाग में.
सोच की जमीं दरकने लगी है,
और खयाल मरने लगे हैं !

इंसानी दिमाग में.......

लफ्ज़ आकार बदलने लगे हैं
अब  गालियों की शक्ल में
अपनों को कोसने लगे हैं
ये क्या चल रहा है
इंसानी दिमाग में .....


अदीब अब महज किताबी अदीब हैं
कातिब हर्फों से जंग करने लगे हैं
सफों के जंगे मैदान में
ये क्या बदल रहा है
इंसानी दिमाग में.....


लफ़्ज़ों के कीचड़ में सराबोर है,
आज हर आम ओ ख़ास ,
मासूम चिलमनों में लग रहे हैं
अब घिनोने दाग, ये क्या हो रहा है
इंसानी दिमाग में......

प्रवीश  दीक्षित "तल्ख़"