Saturday, May 25, 2013

वो नहीं जानते .........


दिल की चीरफाड़ से ,क्या हांसिल उन्हें
वो मेरे भोले सनम यह भी नहीं जानते !


ज़र्रा दर ज़र्रा, रग दर रग, टटोले जाते हैं
आरजू ओ तलाश क्या, ये भी नहीं जानते !

ज़ज्बे दिल में बने, आंखों से बयां होते हैं

पढ़ भी लेते, मगर रूबरू होना नहीं जानते !

सफों पे हर्फों से गुफ्तगू का है शौक उन्हें
ये कातिब राज ऐ दिल पढना नहीं जानते !


नज़र ये मिल भी जाए तो झुका लेते हैं" तल्ख़"
की मेरे कातिल , क़त्ल करना भी नहीं जानते !!


ढाई हर्फ़ के खेल को जो समझा, जहाँ पाया
उल्फत क्या होती हैं मेरे महबूब नहीं जानते !! 


प्रवीश  दीक्षित " तल्ख़"

 

Wednesday, May 22, 2013

एक ख्याल फिर से ...



किसी की ख़ामोशी के सदके
ये अजब सी वार फेर है !

कि शोर ने समझी है,
आज जुबां सन्नाटों की !


एक मचलते सुर ने आज
वीरान साज़ पे इनायत की है!

कि इन खामोश तरानों को ,
हसीं ख्याल ने गुनगुनाया है


इकरार है या इजहार , खुदा जाने
कि फिर से बारिश ने आज
तपती ज़मीं को जिंदगी दी है
 

अंजामे उल्फत को अबतलक,
इस जहाँ में किसने जाना है,
की उनके बरमला इश्क में
हमने अपनी रज़ा दी है !!


प्रवीश  दीक्षित ' तल्ख़'

 

Monday, May 13, 2013

ख्याल / ख़ामोशी


मेरी ख़ामोशी को वो आज फिर हिला गया ,
इक ख्याल मेरे जेहन से फिर टकरा गया !


तनहाइयाँ लिपटी हुई थी किसी बेल की तरह ,
इक तूफ़ान इस दरख़्त से फिर टकरा गया !!


बादलों की शरारत थी चाँद को ज़मीं ना मिली,
शोख झोंका हवा का इक चिलमन को हटा गया !!


उनकी ये चाहत थी कि हम उन्हें पनाह दें ,
इक खंजर ये गुजारिश इस दिल से कर गया !!


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'


 

Wednesday, February 6, 2013

ये क्या हो रहा है ........



एक वैचारिक अकाल सा मचा है,
इंसानी दिमाग में.
सोच की जमीं दरकने लगी है,
और खयाल मरने लगे हैं !

इंसानी दिमाग में.......

लफ्ज़ आकार बदलने लगे हैं
अब  गालियों की शक्ल में
अपनों को कोसने लगे हैं
ये क्या चल रहा है
इंसानी दिमाग में .....


अदीब अब महज किताबी अदीब हैं
कातिब हर्फों से जंग करने लगे हैं
सफों के जंगे मैदान में
ये क्या बदल रहा है
इंसानी दिमाग में.....


लफ़्ज़ों के कीचड़ में सराबोर है,
आज हर आम ओ ख़ास ,
मासूम चिलमनों में लग रहे हैं
अब घिनोने दाग, ये क्या हो रहा है
इंसानी दिमाग में......

प्रवीश  दीक्षित "तल्ख़"

 

Thursday, December 6, 2012


इस शब के सितारे की खामोश गुज़र देखी,
बादल से मोहब्बत का पलभर ही अँधेरा है!

यह वो मयकश है , जो प्यास जगाता है
कभी राह दिखाता है, कभी राह भुलाता है !!

 
छू लेता है, तेरा लिखा हर लफ्ज़ रूह को ,

हर नज़्म तेरी,  इस जिस्म की हरारत है !

फ़क़त यादों की नुमाइश हैं, हर्फों के मेले हैं

वर्ना इस सेहरा सी जिंदगी में रखा क्या है !!

Friday, May 25, 2012

हैं अभी और बाकी ......

राह-ऐ-उल्फत में , इंतज़ार हैं अभी और बाकी ,
ये शोर ना थमेगा , जब तलक तलबगार हैं बाकी !


अलसाई सुबह में रात का खुमार है अभी और बाकी ,
चिलमनें तो हट गई , मगर दीदार अभी और बाकी !


मयकदे खाली हुए ,मगर प्यास है अभी और बाकी ,
तमाम जिस्म बुझ गया , दिल में तपिश अभी और बाकी !


दहशतगर्दी से निजात हो , ये आगाज़ है अभी और बाकी ,
जंग से क्या हांसिल उन्हें , यही अंजाम अभी और बाकी !


सियासत की बाजीगरी के कितने करतब हैं अभी और बाकी ,
की इन्सां की नुमाइश है फ़क़त सौदागिरी अभी और बाकी !

हदों पे कितना लहू बहा , ये सब हिसाब हैं अभी और बाकी ,
कितने सीने चाक , कितने दामन भीगे देखना अभी और बाकी !

दास्तान यूँ ना होगी तमाम, कलम में स्याही है अभी और बाकी,
मुल्क की आवाज़ बने ' ऐ तल्ख़'अरमान हैं बस ये और बाकी !!

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'