Sunday, November 13, 2011

मेरा अक्स मेरे रूबरू है ......


आबो हवा में आज कल ख़ास तबदीली है,
मेरा अक्स मेरे रूबरू है, आईना खाली है !!


ये झुलसती राहें है और हम सफ़र में हैं,
साँसे अंगार हैं , और पेट , पांव खाली है !!


छूएं भी तो कैसे , इन तपती मंजिलों को ,
दहक रही हैं दीवारें , और मशक खाली हैं !!


शैतानियत सी सवार है हर एक शख्स पे,
खुदा बचाए , घर में दरवाजा है ना जाली है!!


जिस जिस कि जुबान पर 'ख़ुदा' था कभी ,
आज हर हाथ में खंजर , जुबां पे गाली है !!


शहर मरघट है या क़यामत है ,' ऐ तल्ख़', ,
जिंदा लाशें सड़क पे हैं, तमाम कब्र खाली हैं

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Wednesday, November 2, 2011

शायरी


इन महफ़िलों से किनारा कर लें ' ऐ तल्ख़'
फिर से खामोशियाँ तुम्हे पुकारने लगी हैं !

ये नकाबी चेहरों की , तंगदिल बस्ती है ,

यहाँ जिन्दगी बिताना मुमकिन नहीं

की फिर कब, कहाँ , किस मोड़ पे तुमसे मिलूं ,
ऐ दिल , बस यही रस्मे इंतज़ार अब बाकी है !!"

मैं ज़फ़ा करता नहीं मगर मेरी भी हद है ,
की मैं इक लम्हा हूँ ,लौट कर आता नहीं !

मेरा इंतज़ार न करना , ऐ मेरे हमनवां,
कहीं तेरा ज़ज्बा , मेरा गुनाह बन जाये !!


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Monday, August 29, 2011

तमाशबीनों की भीड़ में खो गया....

आज तमाशबीनों की भीड़ में खो गया वो ,
चेहरा जो मेरा था , ना जाने किसका हो गया

हमने कई बार पुकारा अपने नशेमन से उसे ,
अब तक मेरा था , अचानक पराया हो गया!!

दिल के गुनाह की सजा , इस रात को मिली ,
पलक झपकी ही थी की फिर सवेरा हो गया !!

सायबान रोशन थे जिसके नूर से अब तलक ,
वो चाँद किसी और आसमां में दाखिल हो गया !!

सैलाब भरा है आँखों में,मगर संभाले भी कैसे ,
ये दिल इस कदर टूटा और धज्जियाँ हो गया!!

वफ़ापरस्ती के बदले जो इनाम बख्शा है हमें ,
वो पल में ही मोहब्बत को बदनाम कर गया !!

ये बस खयालातों की 'धींगामस्ती' रही ,ऐ 'तल्ख़'  ,
वो जिस्म तो छोड़ गया, मगर रूह साथ ले गया !!

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Monday, August 15, 2011

तुम जो मिले


मैं बिखर रहा था राद-ए-गुल की तरह ,
तुने सहेजा और ज़ुल्फ़ में सजा लिया !

किसी बिछोने की सलवट सी थी ये जिंदगी ,
तुने संभाला , सजाया और सेज में ढाल लिया !

मैं सेहरा में पड़ा था , बेजान  रेत की तरह ,
तू बूंद बन कर गिरी ये जीवन संवार दिया !

एक पत्थर था मैं , इसके सिवा कुछ नहीं ,
तेरा हाथ लगा, और मुझे मूरत बना लिया !

कैसे शुक्र अदा करें तेरे अहसान का 'ए तल्ख़',
की जो उम्मीद थी खुदा से, तुने अदा किया !!

प्रवीश दीक्षित'तल्ख़'

Saturday, July 23, 2011

ख्वाब डराने लगे हैं ...



तुम मेरे सभी ख्वाब रख लो , अब ये डराने लगे हैं !
फ़क़त , कोरी नींद चाहता हूँ मैं ,हादसे रोज जगाने लगें हैं!!

मैंने खामोशियों को ओढ़ लिया , एक लिहाफ की तरह !
इस खिली धूप में , सर्द कोहरे , फिर से छाने लगे हैं !!

मैंने देखा था जिन्हें अपने चारसू रोज घटते हुए !
की गीली आँखों से वो मंज़र अब धुंधलाने लगे हैं !!

मैंने बस इंसानियत ही तो मांगी थी , हुक्मरानों से !
की बगावत के मुझपे , अब इलज़ाम आने लगे हैं !!


कोई रंजिश तो ना थी मेरी , तेरे निजाम से !
की पर्चों में इनामी इश्तेहार अब आने लगे हैं!!

हम फ़रियाद करें भी तो किनसे ,अब ये तुम कहो !
सफेदपोश ,काले लिबास में अब नज़र आने लगे हैं !!

ये वक़्त-ऐ-क़यामत का दौर है ऐ ' तल्ख़ ' !
फिर गुलामी के दिन अब याद आने लगे हैं !!


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'

Thursday, July 21, 2011

"इक नदिया"




इक धारा अलबेली ,
चली निपट अकेली !
झरनों का आलिंगन ,
परबत से अठखेली !

आड़ी टेडी राहों से ,
चली भरने ,धरती की झोली !
सागर से मोहब्बत और ,
साहिल से ठिठोली !

जैसे नई नवेली कोई
सोलह श्रंगार किये ,
पिया को रिझाने चली!
जंगल प्यासे,
किन्जिल प्यासे,
प्यासे पशु पखेरू
गांव भी प्यासे
शहर भी प्यासे
प्यासे सब नर नारी !

बल खाती ललना सी ,
इठलाती चपला सी ,
राह में आये
सभी दर्प हटाने चली !
ये दरिया की हमजोली ,
सब के दरद मिटाने चली !!



प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'