Wednesday, July 20, 2011

खुदा मेरे ख्वाबों को ..




खुदा मेरे ख्वाबों को हवा दे दे अगर ,
मैं यहाँ कि फिजां में , नया रंग भर दूँ !



दे के हवाओं को मोहब्बत का मैं नारा ,
फिर से बुलंद मैं , वतन का इकबाल कर दूँ !



देकर उक़ूबत , हर अदू - ऐ- हिंद को मैं ,
मुल्क में फिर से अमन का राज कर दूँ !



ज़ज्बा-ऐ-जन्नत हैं बसते, यहाँ हर शख्स में ,
बद को मिटा कर , खुशियों की तासीर कर दूँ !



फाक़ों की न फ़िक्र हो,अब किसी भी शख्स को
मैं एहतियाज़े रसद का वो इन्तिज़ाम कर दूँ !!

Thursday, July 14, 2011

हमने देखी है........






साहिलों को तोड़ के , शहरों को मिटा दे जो ,
सुख गई नदियों की , ऐसी रवानी देखी है !

हदों को तोड़ के , मौत को जीत लाएं जो ,
कमसिनों में वो जोश-ओ-जवानी देखी है !!"

चीर के दरख्तों को , जो दो फाड़ कर दे ,
इस धरा पे भीम सी , वो हौसलाई देखी है!

तुम कमज़ोर नहीं हो इस जहाँ में ऐ दोस्त ,
तुममे दहकते अंगारों कि इक कहानी देखी है!

हिला दे ये दुनिया , कदम की एक ठोकर से,
जवानों , तुम में वो ताक़त अनजानी देखी है !

कौन कहता है 'क्रांति' हो नही सकती ऐ 'तल्ख़',
फिर से शोख़ हाथों में , वो 'तलवार पुरानी' देखी है






प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

मुंबई





लगी हो आग कैसी भी,
समंदर से नहीं ज्यादा ,
उसे बुझना ही होगा ,
यहाँ दहक कम है नमी ज्यादा !

जो बादल से गिरता है,
धरा पर प्राण बन कर के ,
इन आँखों से बहे जितने
उन अश्कों से नहीं ज्यादा !!
धमाके कुछ कर ना पाएंगे ,
यहाँ दिलों में है लौह ज्यादा !

कितने अपनों को खोया है ,
ये गिनती है नहीं अब तक
हमें तुमसे यह शिकवा है ,
औरों से कहीं ज्यादा !!

लगे वो दाग छाती पे ,
कभी जो मिट ना पाएंगे
उन्हें बेदाग़ करने का ,
तुम कर पाए यदि वादा !!



प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Sunday, July 10, 2011

मयकशे खामोश हुए




मयकशे खामोश हुए , साकी के चले जाने के बाद,
की अब ये होश फ़ना हैं होश में आ जाने के बाद !!

सब कुछ लुटा दिए , तिशनगी में आपकी ,
आँख से अश्क , मांगे हैं हिसाब आप के जाने के बाद !!

कहा है दिल से ज़ज्ब कर ले ज़फ़ा की रवायत ,
की ये कोई क़यामत तो नहीं, इतना सहने के बाद !!

ऐ दिल , उसने उल्फत की , चाहे खेला ही सही ,
शायद याद आऊँ कभी ,मैं भी मिट जाने के बाद !!

हमने इंतज़ार किये बेसबब पर वो ना आई कभी ,
ये उम्मीद की वो आये वहां ,मेरे घर जाने के बाद !!

इन कंटीली यादों से किनारा कर लें ' ऐ तल्ख़' ,
की ना फिर याद आयें वो , सब भूल जाने के बाद !!






प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Thursday, July 7, 2011

आज शाम धुंधली है






आज शाम धुंधली है कहीं किसी का घर जला होगा,

बड़ी ख़ामोशी है यहाँ चीखों का कारोबार हुआ होगा !!



शहर के चौक में गूंज रही हैं ,जवान सिसकियाँ ,

की फिर वहां हैवानियत का नाच हुआ होगा !!



आज फिर किसी की मासूमियत का क़त्ल हो गया,

की ना जाने किस माँ का कलेजा चाक हुआ होगा !!



शिक्षा के मंदिर में एक मनहूसियत सी फैली है

की फिर यहाँ शिक्षा का बलात्कार हुआ होगा !!



तमाम अस्पताल और बाज़ार अटे पड़े हैं लाशों से ,

की यहाँ किस कदर मुर्दा जिस्मो का व्यापार हुआ होगा !!



आइये हम भी अपने जिस्म की रगें टटोलें

की कभी तो इनमे भी लहू का उबाल हुआ होगा !!



आज फिर से दिल्ली में जश्न का माहौल है ' तल्ख़'

की फिर मुल्क की आवाम का हक खाक हुआ होगा !!



प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Monday, June 27, 2011

दोहे

1
चढ़ा बलि नैतिकता की
भूल गए सब कर्त्तव्यों को !
स्वार्थ का पीछा करने की
होड़ मची है इंसानों में !!
2
धर्म का चोला पहन के,
बात करें ये कैसी !
स्वामी अग्निवेश ने कर दी ,
सारे धर्म की ऐसी -तैसी !!
3
सारा देश लुटाय के ,
सरकार हो रही मस्त!
जनता भूखी मर रही ,
महंगाई कर रही त्रस्त !!
4
चोर लुटेरे, मंत्री ,
डाकू, संत फकीर
पूंजी पुरे देश की ,
खायी बना के खीर


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'

यादें





नहीं जानिब कोई अपना ,
तो सहारा देती हैं यादें !
कहीं दिल टूटते हैं तो ,
मलहम बन जाती है यादें
वो यादें ही होती हैं ,
जो बिछड़ों को मिलाती हैं!
जो खुशियाँ ढूंढ़ लें गम से,
ऐसी हमदम होती हैं यादें !!'


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'