Monday, June 27, 2011

दोहे

1
चढ़ा बलि नैतिकता की
भूल गए सब कर्त्तव्यों को !
स्वार्थ का पीछा करने की
होड़ मची है इंसानों में !!
2
धर्म का चोला पहन के,
बात करें ये कैसी !
स्वामी अग्निवेश ने कर दी ,
सारे धर्म की ऐसी -तैसी !!
3
सारा देश लुटाय के ,
सरकार हो रही मस्त!
जनता भूखी मर रही ,
महंगाई कर रही त्रस्त !!
4
चोर लुटेरे, मंत्री ,
डाकू, संत फकीर
पूंजी पुरे देश की ,
खायी बना के खीर


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'

यादें





नहीं जानिब कोई अपना ,
तो सहारा देती हैं यादें !
कहीं दिल टूटते हैं तो ,
मलहम बन जाती है यादें
वो यादें ही होती हैं ,
जो बिछड़ों को मिलाती हैं!
जो खुशियाँ ढूंढ़ लें गम से,
ऐसी हमदम होती हैं यादें !!'


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Sunday, June 26, 2011

कलम और तलवार

तलवार ने टोका इक बार कलम को ,
बता री , रंग कौन भला ?

जो सफे चढ़ा , जो धार चढ़ा ,
''कलम का जवाब था ''
जो धार चढ़ा , वो लहू बना ,
और भय का पर्याय बना,
जो सफे चढ़ा , वो ज्ञान बना ,
इतिहास बना, विश्वास बना ,
इस जग का बदलाव बना... !!



प्रवीश दिक्षित ' तल्ख़'

Wednesday, June 8, 2011

शायरी



कल तक जो चलाता रहा दिलों पे नश्तर
आज उसका दिल भी लहुलुहान है !
की मैयत पर मेरी, तेरा अश्क जो टपका
ये मेरी मौत पर तेरा अहसान है !!

जज्बात ने अख्तियार कर ली शक्ल "हर्फ़ " की ]
काफिया , ग़ज़ल होने का अब अहसास मांगता है ,
हसरतें दिल की बदल गई , जुनून में अब ,
तू मिलेगा कभी तो ,यही इंतज़ार मांगता है !! ''


देखा नहीं ख्वाब तलक जिसका कभी
'वही' चेहरा -ओ-तस्वीर बनाता है दिल ,
मिल जाएँ कभी 'वो' मुराद बनकर ,
आरजू में उनकी , कसमसाता है दिल!!

'' तेरे ये शेर पढ़ कर दिल-ए-दर्द मिट जाता है,
की तेरी शायरी में कोई 'रूहानी' दखल रहता है !!
प्रवीश दिक्षित' तल्ख़'

Friday, February 25, 2011

पर्दा नशीं


पर्दानशीनों की महफ़िल में , सभी जुदा-नकाब हैं,
हम अनजान होकर भी , बड़ी पहचान रखते हैं।

तुम हमसे दूर रहते हो हम तुमसे दूर रहते हैं ,
तुम्हे हर बार छूने का , हम अहसास रखते हैं।

बड़े मशहूर हैं किस्से तेरी एय्यारी के ज़ालिम ,
हकीक़त मेरी भी लेकिन , फ़साने साथ रखती है।

हमें तुम ढूँढना चाहो ,ये मुमकिन नहीं शायद ,
हवा में घुल जाने का , हुनर हम साथ रखते हैं।

हमें महसूस करके तुम, हमारी चाह समझ लेना,
मिटा कर इस बदन को , अब रूह तेरे नाम करते हैं।



प्रवीश दिक्षित

फिर से शायद




इन सुलगते अंगारों को सहेज कर रखना ,
की कहीं ये सर्द रातें और लम्बी हों शायद।

सारी ताक़त अपनी बाजुओं में समेटें रखना ,
की फिर से वतन को तुम्हारी ज़रूरत पड़े शायद।

इन दरख्तों को अब कटने से बचाए रखना ,
की कल फिर यहाँ धूप तेज पड़े शायद।

तुम अपनी आँखों को अब खुली ही रखना,
की ये मंजर अब और खराब हों शायद ।

इन साहिलों की हदों को और कस के रखना,
की फिर से कोई तूफां यहाँ दस्तक दे शायद।

प्रवीश दिक्षित

Friday, November 19, 2010

शायद


तू अब हांसिल नहीं किसी को , जो मिलता था हमेशा ,
कि तू कभी ' आम ' था , अब 'ख़ास' हो गया है शायद !

तेरे वादों पर न रहा , एतबार अब किसी ,को
कि तू जो कहता है , वो करता नहीं शायद !

तेरी 'कथनी' तेरी 'करनी' से जुदा है हमेशा ,
कि तू निजामी में कोई दखल रखता है शायद !

फरेब करता रहा है 'जम्हूरियत' से हमेशा ,
कि ख्वाहिशों कि तामील,अब मुनासिब नहीं शायद !

ठोकर से गर्दिशों कि , जागा है यूँ आवाम,
कि तेरी झूंठी मेहरबानियाँ,अब न कबूल हों शायद !

आज तेरे सफ़ेद लिबास पे कोई दाग नहीं है ,
कि पोशीदा रूह की तरफ देख, मैलज़दा हो शायद !

तेरे शहर में एक ईमारत ढह गई,सैंकड़ो फ़ना हुए,
कि ज़रा सोच, दफिनें में तेरी भी 'लाश' दफ़न हो शायद !


तु करता रहा है 'दलाली' , मुल्क के गुरुर कि,
कि तेरी इस 'ज़लालत' की, भी कोई सजा हो शायद !!


प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'