Wednesday, November 11, 2009

तपिश (राष्ट्रदूत साप्ताहिक में प्रकाशित)

कोई कसर बाकि न रखी , तुमको पा लेने की मैंने ,
कि हर गुजारिश ने दम तोड़ दिया , आज तेरे आगे ।

कोई वजहात भी न थी , जो तुझसे जुदा था मैं ,
कि न जाने क्या गुनाह था , और कैसी सज़ा थी ये ।

बदगुमानी ने जो तन्हाई का तोहफा दिया है ,
कि अक्सर गुफ्तगुं होती रही , मेरी खामोशियों के साथ।

अब तो घुट गई है आवाज भी हलक में ,
कि कैसे बयां करूँगा मैं दीवाना -ऐ-हाल आज ।

वक्त कि तपिश के शिकार अकेले नही हैं हम ,
कि फैली पड़ी है राख , शहर-ऐ-तमाम में ।

Tuesday, October 27, 2009

जरा देर सही

ना बुझा उम्मीद के चिराग ,जिंदगी रोशन होगी कभी ,
ज़रा देर सही .........
छंट जाएगा ये अँधेरा , होगी सहर कभी न कभी ,
ज़रा देर सही...........

गुजश्ता जिंदगी को याद कर , वक्त- ऐ- सुखन आएगा कभी ,

ज़रा देर सही.........
कतरा कतरा लम्हे , कसक पर्वत सी , ये वक्त-ऐ-दर्द है कटता नही अभी,
जहाँ में , कोई तो होगा तेरा , कि 'फ़रिश्ता ' सिर्फ़ बयां नही ,

ज़रा देर सही...........
छटपटाया हमेशा जिसकी चाहत में , वो आरजू पूरी होती नही , अभी

सूनी है गलियां चाहत की , वीरां हैं शहर अरमानों के ,
बस जाएँगे वहां भी आशियाने , होगी रहगुज़र भी ,

ज़रा देर सही.........

ये बैचेनी , ये बेचारगी हो जाएंगी गर्क , महकेंगी कलियाँ खुशिओं की कभी ,
ग़मों का कफ़न ढक ना सकेगा , सुखों की लाश को ,

कि होगी फ़िर से कोई जुम्बिश ,
ज़रा देर सही........!

Friday, October 16, 2009

शुभ दीपावली

हर रोज सहर सूरज की किरने,
धरती को चूम के जाएं।
हर रोज तुम्हारे आँगन में ,
खुशियों की कलियाँ मुस्काएँ ।
यही दुआ करते हैं रब से ,
कि ऐ दोस्त तुम्हारे जीवन में
हर रोज दिवाली आये ॥


Saturday, October 10, 2009

मेरी आशा

चंचलता का बोध करते ,
नैन तुम्हारे मतवाले ।
हिरनी जैसी आंखों वाली ,
क्या नाम तुम्हारा मृगनयनी है ।
केश तुम्हारे गहरे काले ,
हों घनघोर घटाएँ सावन की।
देह की रंगत ऐसी पाई,
सिन्दूर मिला हो माखन में।
हे ! गौर वर्ण नव यौवना ,
नाम तुम्हारा रम्भा है।
मुख पर तेज अप्सरा जैसा ,
और गालों पे लाली है।
दंत पंक्तियाँ धवल तुम्हारी ,
मानो मोती जड़े हुए हों
पहचान गया हूँ तुमको देवी,
क्या तुम परियों की रानी हो ?
बोल तुम्हारे इतने मीठे ,
मधुकोशों में मधु लगता है।
शब्द तुम्हारे मुख से निकले ,
ज्यों पुष्प कहीं पे झरता है ।
हे ! मधुर वाणी की स्वामिनी ,
तुम वामा भेष में कोकिल हो।
हे ! अनिघ्द सुंदरी व्यक्त करो अब ,
कुछ तो अपना परिचय दो ।

चंचलता का बोध कराते,
ये नैन हमारे मतवाले ,
न हिर्नाक्षी न मृग नयनी ,
मैं तो तेरी आशा हूँ ।
ना रम्भा हूँ ना परी हूँ मैं ,
मेरा परिचय इतना है ,
की खोज रहे हो जिसे स्वप्न में ,
मैं वो तुम्हरी अभिलाषा हूँ ।
मृदु वाणी की खुशबु से,
मैं ह्रदय तुम्हारा महकाऊँगी ।
ढाई आखर का ग्रन्थ सिखाकर ,
मन उपवन में बस जाउंगी ॥





Saturday, October 3, 2009

यादों का सफर

हर सुबह जब आँख खोलता हूँ ,
सामने पाताहूँ एक मासूम चेहरा ,
प्रेम रस बिखेरता आत्मीयता जताता सा।
प्यारी आँखे कभी बोलती सी , कभी डोलती सी
पलकें जो गिरती मतवाला करती ,
पलकें जो उठती दीवाना बनाती ।
होंठ चुप हैं मगर बोलते से ,
कपोलों की लाली शिकायत सी करती ,
लटें रेशमी सी और घनी लम्बी काली
बल खाए ऐसे , नागिन मतवाली ।
साँसे महकती हों फूलों की डाली ,
इसे देखता हूँ मैं और सोचता हूँ
ये है कोई अपना या महज एक सपना ,
छूता हूँ उसे तो एक हलचल सी होती ,
वहां चेहरा नही है बस इक 'सिफर ' है ,
ये आपकी खुबसूरत यादों का सफर है॥


(अर्थ :- सिफर - शून्य )

Saturday, September 26, 2009

दर्द - ऐ - इश्क शायरी

ऐ मेरे रकीब , तुम क्यों हबीब बनते हो ,
ज़फाओं की दलदल है मेरा दिल , क्यों मोहब्बत गर्क करते हो।
मैं दर्द -ऐ-वक्त का मारा हूँ , ऐ मोहब्बत ,
कि कोई निशां बाकी न रहा ,जिन्दगी पे चोट का।

तेरी हमसफर्गी ना हो सकेगी नसीब मुझे,
मेरी उल्फत 'तन्हाई ' से है , तू साथ रहे न रहे।

ग़मों की डोर सिमटी है , मेरे दर्द की चरखी में ,
कि पतंग-ऐ-इश्क उडेगी न तेरी ,हुस्न-ऐ-हवा चले न चले।

न कोई हमदम ना साथी मेरा , तुने अपना बनने की ठानी,
कि मैं 'सन्नाटों ' का तलबगार हूँ ,ये मजमा-ऐ-जहाँ रहे न रहे।

Friday, September 25, 2009

दो और दो पॉँच

इक शाम अनोखेराम , अपनी पत्नी से बोले ,
'प्रिये' पढ़ी लिखी हो , तुमसे हम इक 'क्वेशचन पूंछे
श्रीमतीजी कुछ सकुचाई , फ़िर झट से बोली ' हाँ'
सखा ने पूछा फ़िर बतलाओ
'' सिंदबाद ने की पृथ्वी के तीन परिक्रमण '',
एक में उसकी मौत हो गई कौनसा था वो भ्रमण ।
श्रीमतीजी तुनक के बोली '' अजी हटाओ ''
इस सदी हुई हिस्ट्री को ना दोहराओ ,''क्वेशचन हो तो
फ़िर कोई मैथ का लाओ ।
वे चोंके फ़िर अकड़ गए , पूछा ,
मैथ का ' क्वेशचन ' अच्छा प्रिये ' बताओ
होते हैं ' दो और दो कितने ',
श्रीमतीजी शीघ्र ही बोली ' दो और दो पॉँच' और कितने ?
चोंक पड़े फ़िर सखा हमारे उनकी मैथ नोलेज पर
दो और दो चार सुना था हो गए 'पॉँच ' ये कबसे
तत्क्षण श्रीमतीजी ने की ,
उनकी जिज्ञासा शांत
कल केबल पर पिक्चर देखी ,
उसमे '' दो और दो थे पॉँच ''॥