Sunday, October 12, 2025

न जाने क्यों...!

 न जाने क्यों आजकल

सब भूलने लगा हूं मैं,

बेढब यादों की कतरनों में खोने लगा हूं मैं ।
आयु का अर्धशतक
जीवन के पिच पर लगा लिया मैने,
कुछ पाने के औसत से पिछड़ने लगा हूं मैं।
जिंदगी में अपनों के
कुछ कर्ज है मुझ पर,
जिन्हें चुकाने से बचने लगा हूं मैं।
ज़हन की हलचलें
अब सोने नहीं देती ,
की जागते हुए ख्वाबों में खोने लगा हूं मैं।
ज़िस्म की हसरतें भी
अब रूआब खोने लगी,
कि अपनी ही रूह से दूर होने लगा हूं मैं।
मायने बदल गए हैं
चाहते आरजू ओ अंदाज के,
की तूफानी था कभी अब फानी होने लगा हूं मैं।।

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख'

Tuesday, August 29, 2017

मशीनी पुर्जा धड़कता है




दिल के लाचार इक शख्स में

मशीनी पुर्जा धड़कता है ,

पथराई पलकें , निस्तेज होठ

और ठहरी हुई आँखें

ना जाने ये वक़्त क्यूँ नहीं ठहरता है

बंद अस्पताली कमरे में ,

क्या कोई ख्याल उस

शख्स के मन में पलता है

गुजश्ता ज़िंदगी के हसीं लम्हो

के सहारे वो मशीन पे जीता है

ये कैसा इंतज़ार है कैसी आस है

खेत सी ज़िंदगी में ज़रीब सांस है

कब टूट जाये , कुछ खबर नहीं

सब है मगर, आज कुछ नहीं साथ है
 
 
                             प्रवेश दीक्षित "तल्ख़ "

Tuesday, August 22, 2017

थोड़ी सी बेगारी कर लें




अम्बर की पगडण्डी पे ,

हवा की सवारी ले कर

चंदा की सैर कर लें

सूरज की सैर कर लें   

 

खाली है जेब तेरी ,

और खाली है पेट

हवा का कलेवा कर ले

पानी से पेट भर ले

 

कर दिया है शुरू अब

जूतों ने मुँह खोलना

कि घिसने लगें हैं पांव
थोड़ी सी बेगारी कर लें
        थोड़ी सी बेगारी कर लें............

Monday, November 17, 2014

सारा जहाँ सो गया जब....



सारा जहाँ सो गया जब ,
मैं जागता रहा , क्यों
इस भीड़ में मैं खो गया, क्यों ?
कहने को तो है , इक दूसरे से ,
प्यार सबको। 

जब वक़्त आया तो सबने  किनारा किया ,
किस के घर में क्या छिपा है ,
अब बस यही आस है ,
पेट सबके भर गए जब ,
बाकी केवल 'चाह' है।

                        प्रवीश दीक्षित'तल्ख़'

वो मेरे क़रीब से .....



वो मेरे क़रीब से ,
कुछ यूँ गुजर गया।
आहटें कदमों की
इस दिल को दे गया।।
धड़कनों का कारवां ,
निकल पड़ा मंज़िलों की तलाश में।
मंज़िल पे उसे पाया ,
तो जाना फ़क़त छलावा था
'दयार' में।।  

              प्रवीश दीक्षित'तल्ख़'

अँधेरा साया गहराता रहा ,



अँधेरा साया गहराता रहा ,
इक शख्स राह में
ठोकर खाता रहा।
गहराते अंधेरों में उसे
उसे कोई मुकाम ना मिला।।

रोशनी मिल भी जाती उसे ,मगर
रात आसमां को चाँद ना मिला।
सितारे कसमसाते रहे तमाम रात
की उसे वो मदद करें ,
मगर ,रात ज़मीं पे ,
उसका नामो निशां ना मिला।।

सर्द हवाओं ने ,थाम लिया
दामन इस कदर ,रात का।
की किसी ठन्डे जिस्म को  ,
अंगार का साथ ना मिला।।

ये हमारी ज्यादती का ही ,
सबक है 'तल्ख़' शायद।
की सर छिपाने को  ,
कुदरत का साथ भी ना मिला।।

                            प्रवीश दीक्षित'तल्ख़'

Monday, July 7, 2014

इक नया रंग फ़िज़ा में.......



इक नया रंग फ़िज़ा में घुल गया.
ये गोरा बदन अब ताम्बई हो गया। 
क्या हुआ, कैसे हुआ हमें क्या खबर
की ये वक़्त भी आसमानी हो गया।।
घुले हुए थे, साये अंधेरों में अब तलक.
उनका वजूद अब जिस्मानी हो गया ।
 
गम-ए-ज़िंदगी से तौबा कर लो ऐ 'तल्ख़'
ये आगाज़ है अब गम बेमानी हो गया।।
 
अकेले ही चले थे राहे सफर में मगर
तुम जब मिले सफर रूमानी हो गया।।

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Friday, August 16, 2013

ख्याल ने खामोशियों को.....




ख्याल ने खामोशियों को

ओढ़ लिया है  इस तरह ,

हम हैं की फ़क़त

झींगुरों के इजहार सुने जा रहे हैं

कोई चुप है तो कोई सुन रहा है ,

कोई थम गया तो कोई चल रहा है!

आज हर शख्स अपाहिज है

इंसान , रास्ते और मंजिलें ,

वक़्त चल रहा है , तब वहां था, अब वहां है

नादान है वो सब जो जीत पे इतराते हैं

देख वक़्त फिर वहीँ खड़ा हंस रहा है

तूफ़ान तो आकर गुजर ही जाते हैं अक्सर ,

बर्बादी की दास्ताँ कहने को साहिल खड़ा है
 
प्रवीश दीक्षित'तल्ख़' 

Monday, June 17, 2013

मेरे मेहरबां

 
मेरे मेहरबां की इन्तहा तो देखिये,
दर्द देकर भी नादान बने रहते हैं !  
 
बात करते हैं, उनसे मर्ज़-ऐ-दिल की ,
वो शफाखाने का पता दे देते हैं !!
 
कि वो एक अदद मुस्कराहट से,
जिस्म में हरारत बिखेर देते हैं !
 
कभी मानते हैं कभी रूठ जाते हैं,
मेरे यार मेरा नसीब बन जाते हैं !!
 
इन अदाओं पर नाजिश करें "तल्ख़",
वो पर्दानशीं होकर सब राज छुपाते हैं
 
प्रवीश दीक्षित "तल्ख़"

Saturday, May 25, 2013

वो नहीं जानते .........


दिल की चीरफाड़ से ,क्या हांसिल उन्हें
वो मेरे भोले सनम यह भी नहीं जानते !


ज़र्रा दर ज़र्रा, रग दर रग, टटोले जाते हैं
आरजू ओ तलाश क्या, ये भी नहीं जानते !

ज़ज्बे दिल में बने, आंखों से बयां होते हैं

पढ़ भी लेते, मगर रूबरू होना नहीं जानते !

सफों पे हर्फों से गुफ्तगू का है शौक उन्हें
ये कातिब राज ऐ दिल पढना नहीं जानते !


नज़र ये मिल भी जाए तो झुका लेते हैं" तल्ख़"
की मेरे कातिल , क़त्ल करना भी नहीं जानते !!


ढाई हर्फ़ के खेल को जो समझा, जहाँ पाया
उल्फत क्या होती हैं मेरे महबूब नहीं जानते !! 


प्रवीश  दीक्षित " तल्ख़"

 

Wednesday, May 22, 2013

एक ख्याल फिर से ...



किसी की ख़ामोशी के सदके
ये अजब सी वार फेर है !

कि शोर ने समझी है,
आज जुबां सन्नाटों की !


एक मचलते सुर ने आज
वीरान साज़ पे इनायत की है!

कि इन खामोश तरानों को ,
हसीं ख्याल ने गुनगुनाया है


करार है या इजहार , खुदा जाने
कि फिर से बारिश ने आज
तपती ज़मीं को जिंदगी दी है
 

अंजामे उल्फत को अबतलक,
इस जहाँ में किसने जाना है,
की उनके बरमला इश्क में
हमने अपनी रज़ा दी है !!


प्रवीश  दीक्षित ' तल्ख़'

 

Monday, May 13, 2013

ख्याल / ख़ामोशी


मेरी ख़ामोशी को वो आज फिर हिला गया ,
इक ख्याल मेरे जेहन से फिर टकरा गया !


तनहाइयाँ लिपटी हुई थी किसी बेल की तरह ,
इक तूफ़ान इस दरख़्त से फिर टकरा गया !!


बादलों की शरारत थी चाँद को ज़मीं ना मिली,
शोख झोंका हवा का इक चिलमन को हटा गया !!


उनकी ये चाहत थी कि हम उन्हें पनाह दें ,
इक खंजर ये गुजारिश इस दिल से कर गया !!


प्रवीश दिक्षित 'तल्ख़'


 

Wednesday, February 6, 2013

ये क्या हो रहा है ........



एक वैचारिक अकाल सा मचा है,
इंसानी दिमाग में.
सोच की जमीं दरकने लगी है,
और खयाल मरने लगे हैं !

इंसानी दिमाग में.......

लफ्ज़ आकार बदलने लगे हैं
अब  गालियों की शक्ल में
अपनों को कोसने लगे हैं
ये क्या चल रहा है
इंसानी दिमाग में .....


अदीब अब महज किताबी अदीब हैं
कातिब हर्फों से जंग करने लगे हैं
सफों के जंगे मैदान में
ये क्या बदल रहा है
इंसानी दिमाग में.....


लफ़्ज़ों के कीचड़ में सराबोर है,
आज हर आम ओ ख़ास ,
मासूम चिलमनों में लग रहे हैं
अब घिनोने दाग, ये क्या हो रहा है
इंसानी दिमाग में......

प्रवीश  दीक्षित "तल्ख़"

 

Thursday, December 6, 2012


इस शब के सितारे की खामोश गुज़र देखी,
बादल से मोहब्बत का पलभर ही अँधेरा है!

यह वो मयकश है , जो प्यास जगाता है
कभी राह दिखाता है, कभी राह भुलाता है !!

 
छू लेता है, तेरा लिखा हर लफ्ज़ रूह को ,

हर नज़्म तेरी,  इस जिस्म की हरारत है !

फ़क़त यादों की नुमाइश हैं, हर्फों के मेले हैं

वर्ना इस सेहरा सी जिंदगी में रखा क्या है !!

Friday, May 25, 2012

हैं अभी और बाकी ......

राह-ऐ-उल्फत में , इंतज़ार हैं अभी और बाकी ,
ये शोर ना थमेगा , जब तलक तलबगार हैं बाकी !


अलसाई सुबह में रात का खुमार है अभी और बाकी ,
चिलमनें तो हट गई , मगर दीदार अभी और बाकी !


मयकदे खाली हुए ,मगर प्यास है अभी और बाकी ,
तमाम जिस्म बुझ गया , दिल में तपिश अभी और बाकी !


दहशतगर्दी से निजात हो , ये आगाज़ है अभी और बाकी ,
जंग से क्या हांसिल उन्हें , यही अंजाम अभी और बाकी !


सियासत की बाजीगरी के कितने करतब हैं अभी और बाकी ,
की इन्सां की नुमाइश है फ़क़त सौदागिरी अभी और बाकी !

हदों पे कितना लहू बहा , ये सब हिसाब हैं अभी और बाकी ,
कितने सीने चाक , कितने दामन भीगे देखना अभी और बाकी !

दास्तान यूँ ना होगी तमाम, कलम में स्याही है अभी और बाकी,
मुल्क की आवाज़ बने ' ऐ तल्ख़'अरमान हैं बस ये और बाकी !!

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़' 

Sunday, May 20, 2012

कहीं कुछ बदल तो रहा है


अब अंगड़ाई ले रहे हैं जज्बात,

कि कहीं कुछ मचल तो रहा है !


हो रही है सीने में एक हलचल सी,
की कहीं कुछ बदल तो रहा है !


एक मुस्कराहट सी थी उन हसीं होटों पे
की बेरुखी का मोम , पिघल तो रहा है !


बिछा दे दिल अपना, उनके क़दमों तले,
ऐसा इक सपना , दिल में पल तो रहा है


लफ़्ज़ों और ज़ज्बों की जुगलबंदी में 'ऐ तल्ख़'
की प्यार का नगमा फिर से बन तो रहा है !


ये दो दिलों की अटपटी सी खामोश आवाजें,
की ये शोर भी सुहाना, अब लग तो रहा है!!

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'

Thursday, May 3, 2012

पति पत्नी नोकझोंक












मित्र अनोखे राम से एक दिन हमने , कर डाला एक सवाल
मित्र कुशल से हो की कल रात तुम्हारे घर हुआ कोई बवाल
हुआ कोई बवाल ' भाभी ' बहुत थी गरजी बरसी ,
सुन कर बात हमारी मित्र ने आँखें तानी..
और बोले " मित्र व्यर्थ की चिंता छोडो ,
और यूँ ही हवा में ना खयाली घोड़े छोडो,
कल रात हमने श्रीमती से कर डाले दो दो हाथ ,
कर डाले दो दो हाथ कि सुंदरी घुटनों आई..
कि अब तक जो खोई थी वो इज्जत पाई "!



बात मित्र कि सुनकर हमको नहीं आया विश्वास,
नहीं आया विश्वास ये भौजी सुधरी कैसे!!
हमने कुछ सोचा और कहा मित्र से कि
कर डालो अब किस्सा पूर्ण बयान !
किस्सा पूर्ण बयान कि हम भी
लेलें तुमसे थोडा ज्ञान,
देख हमारी जिज्ञासा, मित्र ने
पूरा किस्सा किया बयान,


" कल रात मांजते बर्तन,
हमसे दो कप क्या टूटे ,
मानों श्रीमती जी के भैरूं रूठे
उसने अपने प्रवचनों का लिया पिटारा खोल,
हमने भी अपने कानों के लिया पटों को मोड़.
तब श्रीमती के क्रोध ने लिया भयंकर रूप
लगा निशाना उसने हम पर बर्तन फेंके,
जो बर्तन हमको लग जाता वो करती अट्टहास,
जो लगे निशाना चूक तो हम भी हंसियाते,
तो मित्र इसी खिचमतानी में ,
श्रीमती के हाथ लग गया लट्ठ ,
देख लट्ठ हाथ में उनके
अपनी हालत पस्त !!
हालत अपनी पस्त पलंग के नीचे दुबके
श्रीमती जी बन रणचंडी हमें लगाये टेर,
और लिए हाथ में लट्ठ ढूंडती कोना कोना
हम भी नीचे सरक लिए ना आये उसके हाथ
ना आये उसके हाथ, हुआ क्रोध जो ठंडा ,
थक चुकने के बाद छोड़ा उसने वो डंडा ,
लेकर गहरी सांस सुंदरी हमें पुकारे
निकल भी आओ,छिपे कहाँ हो प्रियवर प्यारे
सुनकर मीठे बोल बचन हम ना बहके ,
डटे रहे हम पलंग के नीचे ख़ामोशी से
इतने में उनके चक्षु मेरे चक्षु से टकराए ,
मित्र हमारे प्राण हलक में आये !
वो मुस्काती मोड़ के 'घुटने
पलंग के पास ही बैठी और बोली
तुम जीते हम हारे,
निकल भी आओ प्रिय प्राण हमारे
उसने मेरा हाथ पकड़ कर हमें निकाला
और डिनर बनाने का दिया हवाला"


लेकर एक निश्वास मित्र ने
किस्सा किया तमाम,
किस्सा किया तमाम कि सुंदरी घुटनों बैठी
मित्र अनोखे राम कि खोई इज्जत लौटी!!

प्रवीश दीक्षित ' तल्ख़'

Saturday, March 31, 2012

सफ़र ये ज़ारी है


बदकिस्मती और खुशकिस्मती, के दरमियाँ ये जिंदगानी है,
बदगुमानियां हों या खुशफहमियां , सफ़र ये ज़ारी है!!



हादसों की बारिश ने इस कदर भिगोया है हमें ,
कि सूखी ज़मीन पे फिसलना अब तलक ज़ारी है!!


इस मैदान सी बन गई जिंदगी में
ग़म-ओ-ख़ुशी की रस्साकशी ज़ारी है!!


ये ना कोई "मेरी कहानी है ना "मेरी जुबानी" है,
आंसुओं की सच्चाई , आँखों से बहना ज़ारी है!!


समंदर में अकेली किश्ती का ना कोई माझी है,
की मेरा मांजी ही मेरे कल की निशानी है !!


हमें जाड़ों के मौसम ने ही जलाया है अक्सर,
की बर्फ का अंगार में बदलना अब भी ज़ारी है!!


यार-ओ-रफ़ीक इक इक कर जुदा हुए 'ऐ तल्ख़' ,
इस जिंदगी में ये सिलसिले अब तलक ज़ारी है!!

Friday, December 2, 2011

अब नहीं आने वाले .........


ख़ामोशी छोड़ कर चले गए जो हैं , लम्हे ,
बज़्म में वो लौट कर अब नहीं आने वाले !!


तुम्हारी नादानियों से टूट गए जो खिलौने,
इन कमजोर कोशिशों से नहीं जुड़ने वाले !!


दिल से मिट चुके हसीं यादों के जो मंजर,
इन पनीली आँखों से कभी नहीं जाने वाले !!


सोचा तुम्हे पुकार लें करीब जाकर, लेकिन ,
हलक में घुटे लफ्ज़ जबां पे नहीं आने वाले!!


वफ़ा की आस में हमें रुसवाई मिलती रही
दिल में लगे दाग अब यूँ नहीं मिटने वाले !!


इस तंगदिली को हम क्या  नाम दें ' ऐ तल्ख़'
ज़फाबाजी के इलज़ाम भी हैं अब लगने वाले !!

खानाबदोशों की महफ़िल है ये दुनिया तमाम
फिर से ये मजमे तमाशे हैं यहाँ सजने वाले !!

प्रवीश दीक्षित 'तल्ख़'